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ईस्ट इंडिया कंपनी ने बिहार और गंगा के मैदान को सरकार के चलाए एक नशे के कारोबार में बदल दिया, और फिर तस्करी का काम निजी फ़र्मों को सौंप दिया। अपने चरम पर अफ़ीम भारत सरकार की दूसरी सबसे बड़ी कमाई थी, और उससे आगे सिर्फ़ ज़मीन पर लगने वाला कर था।
गाज़ीपुर में गंगा के किनारे एक चारदीवारी वाला अहाता खड़ा है, किसी छोटे क़स्बे जितना बड़ा। उन्नीसवीं सदी भर उसके भीतर मज़दूर कच्ची अफ़ीम परखते, उसे मिलाते, करीब एक किलो की टिकिया बनाते और उन्हें संदूक़ों में भरते रहे।
संदूक़ नदी के रास्ते कलकत्ता जाते, वहाँ नीलामी घर में पहुँचते, और फिर तेज़ चलने वाले जहाज़ों पर लदकर चीन के तट की ओर रवाना हो जाते, जहाँ इस माल को बेचना जुर्म था।
यह कोई काला बाज़ार नहीं था। यह एक सरकारी विभाग था। वह कारख़ाना आज भी वहीं है, आज भी अफ़ीम बनाता है, क़ानूनी तौर पर, दवाओं के लिए, उसी जगह पर जहाँ वह 1855 से खड़ा है।
दिक्कत चाय की थी
ब्रिटेन को एक महँगी लत लग गई थी। उसे चीनी चाय, रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तन चाहिए थे, और बदले में उसके पास ऐसा कुछ नहीं था जो चीनियों को चाहिए हो। सो वह चाँदी में दाम चुकाता था, और चाँदी लगातार देश से बाहर जाती रहती थी।
अफ़ीम ने यह मुश्किल हल कर दी। उसे भारत में उगाओ, चीन में बेचो, उस कमाई से चाय ख़रीदो, और चाँदी घर पर ही रह जाती है।
चीन ने 1796 तक इस नशे पर पूरी तरह रोक लगा दी थी, और 1838 तक तस्कर को इसके लिए मौत की सज़ा तक हो सकती थी। इससे कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा। 1800 के दशक के शुरुआती सालों में ब्रिटिश व्यापारी हर साल एक हज़ार टन से ज़्यादा भारतीय अफ़ीम चीन में उतार रहे थे।
एकाधिकार विरासत में मिला, फिर कारख़ाने जैसा बना दिया गया
भारत में अफ़ीम पर सरकारी एकाधिकार अंग्रेज़ों की ईजाद नहीं था। सोलहवीं सदी में मुग़ल ऐसा एकाधिकार चलाते थे, और जैसे-जैसे मुग़ल ताक़त ढली, बिहार की अफ़ीम पर नियंत्रण पटना के व्यापारियों के हाथ आ गया।
1773 में बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर वॉरेन हेस्टिंग्स ने बंगाल का पूरा अफ़ीम कारोबार कंपनी के नाम कर लिया और उत्पादन का काम ठेकेदारों को बाँट दिया। एकाधिकार का मतलब यहाँ वही है जो सुनने में लगता है: ख़रीदार क़ानूनी तौर पर सिर्फ़ एक, दाम भी एक, और वह दाम वही तय करता है जिसके हाथ में यह अधिकार हो।
ठेकेदार माल में मिलावट करते थे और उगाने वालों पर दबाव डालते थे, सो 1797 में कंपनी ने अपने ज़माने के हिसाब से एक असामान्य काम किया। उसने उत्पादन सीधे सरकार के हाथ में ले लिया।
दो अफ़ीम एजेंसियाँ बनीं, एक बनारस में और एक पटना में। हर एजेंसी एक अफ़ीम एजेंट के हाथ में थी, जो कलकत्ता के राजस्व विभाग को रिपोर्ट करता था। कच्ची अफ़ीम गाज़ीपुर और पटना के कारख़ानों में जाती, जहाँ उसे परखा, मिलाया और पैक किया जाता था।
1879 तक इन दोनों एजेंसियों ने मिलकर 13 लाख से ज़्यादा किसानों को लाइसेंस दे रखे थे: बनारस में सोलह ज़िलों में 631,226 और बिहार में ग्यारह ज़िलों में 713,192। दोनों को मिलाकर करीब 562,000 एकड़ ज़मीन पर पोस्ता खड़ा था, और लगभग पूरी फ़सल एक ही ख़रीदार देश के लिए थी।
पेशगी
किसान ज़मीन के एक तय टुकड़े पर पोस्ता उगाने का लाइसेंस लेता था, और उसके बदले बोआई से पहले सरकार से नक़द पेशगी पाता था। फ़सल कटने पर वह अपनी अफ़ीम सौंप देता और उसकी बनती रकम में से पेशगी काट ली जाती। तय मात्रा से कम निकली तो पैसा वापस वसूल लिया जाता था।
जिस किसान के घर का भंडार ख़ाली हो, उसके लिए बोआई से पहले मिलने वाला नक़द बहुत बड़ी पेशकश है। लेकिन वह क़र्ज़ भी है। और दूसरे सिरे पर मिलने वाला दाम बाज़ार का दाम नहीं होता था, वह वही होता था जो अफ़ीम विभाग तय कर दे।
काग़ज़ पर किसी को मजबूर नहीं किया जाता था। बंगाल रेगुलेशन में एजेंटों को किसी से ज़बरदस्ती पोस्ता उगवाने से रोका गया था, और यह हर आदमी की अपनी मर्ज़ी पर छोड़ा गया था कि वह नाम लिखवाए या मना कर दे। बिहार के किसी गाँव की असल ज़िंदगी भी ऐसी ही थी या नहीं, इतिहासकार आज तक इसी पर बहस कर रहे हैं।
वह काम जो कंपनी दिखाती थी कि वह करती ही नहीं
चीन में अफ़ीम बेचना तस्करी थी, और कंपनी यह जानती थी। इसलिए उसने चीन में बेचा ही नहीं। उसने कलकत्ता में बेचा।
संदूक़ नीलामी में निजी सौदागरों के हाथ चले जाते थे, और वही नशा, मुनाफ़ा और क़ानूनी ख़तरा, तीनों लेकर पूरब की ओर बढ़ते थे। 1834 के बाद, जब चीन के व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार ख़त्म हुआ, यह कारोबार जार्डिन, मैथेसन एंड कंपनी और डेंट एंड कंपनी जैसी फ़र्मों के हाथ आ गया। पाँच साल में निर्यात दोगुना हो गया, 1834 से 1835 के 21,885 संदूक़ों से बढ़कर 1838 से 1839 में 40,200।
वह अफ़ीम जिस पर ब्रिटेन का बस नहीं चला
बंगाल की अफ़ीम का एक प्रतिद्वंद्वी भी था। मालवा के पठार पर, यानी आज के पश्चिमी मध्य प्रदेश और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में, ब्रिटिश राज से बाहर की रियासतें अपनी अच्छी-ख़ासी अफ़ीम उगाती थीं, और भारतीय तथा पुर्तगाली व्यापारी उसे बाहर भेजते थे।
1803 से कंपनी ने इस कारोबार का गला घोंटने की कोशिश की और पश्चिमी तट से अफ़ीम का निर्यात रोक दिया। तस्करों ने घूमकर रास्ता निकाल लिया: उत्तरी मालवा से राजस्थान के पाली तक, फिर थार के रेगिस्तान के पार कराची, और वहाँ से समुद्र के रास्ते पुर्तगाली बंदरगाह दमन, जो इस कारोबार पर रोक लगाने के बजाय उससे कर वसूलता था।
इसके बाद ब्रिटेन ने मालवा की अफ़ीम ख़ुद ख़रीदकर बंबई में नीलाम करने की कोशिश की। वह भी नाकाम रही। 1831 में उसने हार मान ली और वही किया जो सीधा-सा रास्ता था: निजी व्यापारियों को बंबई के रास्ते निर्यात करने दो और हर संदूक़ पर एक शुल्क वसूल लो। जिस कारोबार पर आपका मालिकाना न चले, उस पर कर लगा दीजिए।
इससे क्या-क्या चलता था
1870 में हाउस ऑफ़ कॉमन्स के सामने रखे गए आँकड़ों में भारत सरकार की आमदनी में अफ़ीम का हिस्सा सदी की शुरुआत में 5 प्रतिशत से कम बताया गया और 1860 के दशक तक बढ़कर करीब 16 प्रतिशत। कुछ लेखक इन आँकड़ों पर भरोसा नहीं करते और लंबे दौर का औसत दसवें हिस्से से भी कम बताते हैं। उनका कहना है कि बड़े आँकड़े सिर्फ़ चरम वाले सालों को चुन लेते हैं। इसे एक पक्का आँकड़ा नहीं, एक दायरा मानकर चलिए।
दोनों पक्ष जिस बात पर सहमत हैं, वह है क्रम। उन्नीसवीं सदी के ज़्यादातर हिस्से में अफ़ीम भारत सरकार की आमदनी का दूसरा सबसे बड़ा ज़रिया थी, और उससे आगे सिर्फ़ ज़मीन पर लगने वाला कर था। किसी एक फ़सल के लिए राष्ट्रीय बजट में यह अजीब जगह है, और यह उसी बड़ी कहानी का एक धागा है कि ब्रिटेन ने भारत को कैसे निचोड़ा।
एक नशे के लिए दो लड़ाइयाँ
1839 में चीनी अधिकारी लिन ज़ेशू ने कैंटन के व्यापारियों से उनकी अफ़ीम ज़बरन सौंपवा ली और करीब 20,000 संदूक़ नष्ट करा दिए। ब्रिटेन ने तोपों से लैस जहाज़ भेज दिए।
पहली लड़ाई, 1839 से 1842 तक, नानकिंग की संधि पर ख़त्म हुई। हांगकांग द्वीप ब्रिटेन को सौंप दिया गया, पाँच संधि बंदरगाह खोले गए (ऐसे बंदरगाह जहाँ विदेशी अपने ही क़ानूनों के तहत रह और व्यापार कर सकते थे), और 2 करोड़ चाँदी के डॉलर चुकाए गए, जिनका एक हिस्सा नष्ट की गई अफ़ीम का मुआवज़ा था। दूसरी लड़ाई, 1856 से 1860 तक, ने चीन को मजबूर किया कि वह अफ़ीम के आयात को क़ानूनी बनाए और काउलून भी सौंप दे।
दो लड़ाइयाँ, सिर्फ़ इसलिए कि बिहार में उगाई गई एक फ़सल ग्वांगझू में बिक सके।
क्या किसान को फ़ायदा हुआ?
यहाँ आकर सबूत दो हिस्सों में बँट जाते हैं, और ईमानदार इतिहास को यह बात कह देनी चाहिए।
आर्थिक इतिहासकार रॉल्फ़ बाउर ने दस लाख से ज़्यादा किसान अफ़ीम उत्पादकों का अध्ययन किया और इस नतीजे पर पहुँचे कि वे घाटा उठाकर पोस्ता उगाते थे और उन्हें इसके लिए मजबूर किया जाता था। मजबूरी किसी ऐसे क़ानून से नहीं आती थी जो बोआई का हुक्म देता हो, बल्कि उस चीज़ से आती थी जिसे वे गाँव के भीतर क़र्ज़, सरकारी ताक़त और सामाजिक निर्भरता का त्रिकोण कहते हैं। अमिताव घोष ने स्मोक एंड ऐशेज़ में लगभग यही बात कही है: जिस ज़मीन पर एक बार पोस्ता चढ़ गया, उस पर और कुछ नहीं बोया जा सकता था, और जो दाम मिलता था वह लागत तक पूरी नहीं करता था।
इसके सामने ऐसे सबूत भी हैं जो बताते हैं कि उगाने वालों के पास हिलने-डुलने की जगह इससे ज़्यादा थी। 1850 के दशक के आख़िर में जब अफ़ीम के दाम गिरे तो वे नील, कपास और गन्ने की ओर चले गए, और राजस्व बोर्ड को यह चिंता सताने लगी कि गन्ने पर मिलने वाली पेशगी पोस्ता को नापसंद बना देगी। 1893 में अधिकारियों ने संसद को बताया कि किसानों को पोस्ता उगाने के लिए राज़ी करना ही मुश्किल हो रहा है, क्योंकि बाक़ी फ़सलों में कमाई ज़्यादा थी।
उत्तरी बंगाल के रंगपुर में इतिहासकार गुनेल सेडरलोफ़ को ऐसे किसान मिले जो एकाधिकार से बाहर, ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से पोस्ता उगा रहे थे, क्योंकि कमज़ोर ज़मीन पर और किसी फ़सल में इतनी कमाई नहीं थी। लाइसेंस के बंधन से आज़ाद होकर वे सरकारी व्यवस्था में मिलने वाले करीब 10 प्रतिशत के मुनाफ़े से कहीं ज़्यादा बचा लेते थे। वे पौधे गाँव की दीवारों के भीतर छिपा लेते थे और वसूली करने वाले आते तो अपने ही खेत जला देते थे।
दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं। फ़सल क़ीमती थी। और उसकी क़ीमत एकाधिकार ले जाता था।
वह आयोग जिसे कुछ ख़ास ग़लत नहीं मिला
1890 के दशक तक ब्रिटेन में अफ़ीम के ख़िलाफ़ चल रहे अभियान ने एक जाँच करवा ही ली। अफ़ीम पर बना रॉयल कमीशन 1893 से 1895 तक लॉर्ड ब्रैसी की अध्यक्षता में बैठा और उसने इस व्यवस्था को काफ़ी हद तक साफ़ बता दिया। उसने भारत में सीमित मात्रा में अफ़ीम के इस्तेमाल की तुलना इंग्लैंड में सीमित शराब पीने से की।
1895 में हाउस ऑफ़ कॉमन्स में सांसदों ने कहा कि सब पहले से तय था। भारत सरकार ने निर्देश जारी किए थे कि गवाहियाँ किस तरह जुटाई जाएँ, जिन गवाहों से असुविधा हो सकती थी उनसे कह दिया गया कि उनका आना ज़रूरी नहीं, और पुलिस अभियान चलाने वालों के पीछे लगी रही। आयोग के इकलौते असहमत सदस्य हेनरी विल्सन ने अलग से अल्पमत रिपोर्ट लिखी।
बाद के ज़्यादातर लेखक इसे लीपापोती कहते हैं। सब नहीं कहते। इतिहासकार जॉन एफ़. रिचर्ड्स ने इस रिपोर्ट को पर्दा डालने की कोशिश नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों के बीच फँसा हुआ दस्तावेज़ माना, और उनका ख़याल था कि अभियान चलाने वालों की अपनी भी कुछ कमज़ोरियाँ थीं जो उन्हें दिखती नहीं थीं।
यह ख़त्म कैसे हुआ
इसे ज़मीर ने नहीं, पैसे ने बंद कराया। चीन के भीतर पोस्ता की खेती इतनी बढ़ी कि 1900 तक अकेला सिचुआन प्रांत पूरे भारत से ज़्यादा पैदा करने लगा, और ब्रिटिश प्यालों में चीनी चाय की जगह भारतीय चाय ले चुकी थी।
1907 में ब्रिटेन और चीन ने दस साल का एक समझौता किया: चीन अपनी फ़सल पर लगाम कसेगा, भारत हर साल निर्यात में करीब 5,100 संदूक़ की कटौती करेगा, और यह कारोबार बंद हो जाएगा। पटना की एजेंसी 114 साल बाद, 1911 में बंद हो गई और बिहार में पोस्ता की खेती ख़त्म हुई। निर्यात का कारोबार 1917 तक समाप्त हो गया। बनारस दवा के बाज़ार के लिए चलता रहा, और 1920 के दशक में भी वहाँ करीब पाँच लाख किसान काम कर रहे थे।
इसका छोड़ा हुआ निशान
अर्थशास्त्री जोनाथन लेने के एक शोध-पत्र में पुराने अफ़ीम इलाक़े के ज़िलों की तुलना ठीक सीमा के उस पार पड़ने वाली ज़मीन से की गई है, जहाँ पोस्ता पर रोक थी। इलाक़े के भीतर हाल यह है कि ज़मीन पोस्ता के जितनी माफ़िक थी, वहाँ साक्षरता उतनी ही कम और सरकारी सेवाएँ उतनी ही पतली मिलती हैं, आज तक। बाहर ऐसा कोई ढर्रा नहीं दिखता। उन ज़िलों में स्कूलों और स्वास्थ्य पर औपनिवेशिक ख़र्च कम था और पुलिस की मौजूदगी ज़्यादा।
एक अध्ययन कोई आख़िरी फ़ैसला नहीं होता। लेकिन बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश ने एक पूरी सदी साम्राज्य के सबसे मुनाफ़े वाले निर्यात की आपूर्ति में बिताई, और आज वे भारत के सबसे ग़रीब हिस्सों में गिने जाते हैं।
अफ़ीम का पैसा खोजना मुश्किल नहीं है। वह हांगकांग में लगा, कैंटन के बड़े व्यापारिक घरानों में लगा, और बंबई तथा लंदन में बनी दौलत में लगा। गाज़ीपुर में, जहाँ यह माल बनता था, उसमें से लगभग कुछ भी नहीं ठहरा।
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
- Nic Allen, 'Bengal Opium: a study in continuity': Engelsberg Ideas
- Amar Farooqui, 'The Global Career of Indian Opium and Local Destinies': Almanack (2016)
- Rolf Bauer, 'The Peasant Production of Opium in Nineteenth Century India': Brill (2019)
- Gunnel Cederlöf, 'Poor Man's Crop: Evading Opium Monopoly': Modern Asian Studies (2019)
- The National Archives (UK): Hong Kong and the Opium Wars
- Hansard, House of Commons: Indian Opium Revenue, 30 June 1893
- Jonathan Lehne, 'An opium curse? The long-run economic consequences of narcotics cultivation in British India'
परदे पर और किताबों में
- Sea of Poppies (2008) , लेखक Amitav Ghosh , English . इबिस त्रयी का पहला उपन्यास, उस दौर का जब चीन का व्यापार युद्ध की ओर बढ़ रहा था।
- The Opium War: Drugs, Dreams and the Making of China (2011) , लेखक Julia Lovell , English . युद्ध, और चीन के भीतर उसे लेकर चली लंबी बहस।
- Smoke and Ashes: Opium's Hidden Histories (2023) , लेखक Amitav Ghosh , English . ग़ैर-कथा पुस्तक: इस व्यापार ने भारत, चीन और ब्रिटेन के साथ क्या किया।
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