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1984 से नब्बे के दशक की शुरुआत तक पंजाब ने सिखों के सबसे पवित्र स्थान में सेना की कार्रवाई, एक हत्या, दिल्ली की सड़कों पर सिखों का संहार और वर्षों की मारकाट झेली। यह वही कहानी है, बिना किसी रस लिए कही गई, और यह भी कि जो समुदाय इसके केंद्र में था वह भारत के केंद्र में बना क्यों रहा।
पहले यह समझिए कि पंजाब है क्या, क्योंकि उसके बिना यह दशक समझ में ही नहीं आएगा।
पंजाब एक छोटा राज्य है। भारत की ज़मीन का पचासवाँ हिस्सा भर उसके पास है। उसी छोटी-सी पट्टी से, ठीक उन्हीं वर्षों में जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, वह गेहूँ और चावल आया जिसने भारत को अनाज मँगाने वाले देश से ख़ुद अपना पेट भरने वाला देश बनाया। यह पंजाब के किसानों ने किया। किसी नीति ने नहीं, किसी मंत्रालय ने नहीं। किसानों ने, अपनी ज़मीन पर, अनजाने बीज पर जोखिम उठाकर।
भारत की आज़ादी की क़ीमत का बड़ा हिस्सा भी पंजाब ने चुकाया है। जलियाँवाला बाग़ अमृतसर में हुआ था। भगत सिंह पंजाबी थे। रणजीत सिंह भी, जिनका राज्य आख़िरी गंभीर भारतीय शक्ति था जिसे अंग्रेज़ों को हराना पड़ा।
और सिखों ने भारत की सेनाओं में अपनी आबादी के अनुपात से कहीं ज़्यादा संख्या में सेवा की है, देश के लड़े हर युद्ध में। लंगर, यानी वह मुफ़्त रसोई जो पंगत में बैठ जाने वाले किसी भी इंसान को खाना खिला देती है, भूकंपों के बाद पहुँची है, बाढ़ों के बाद पहुँची है, और एक महामारी के मुहाने पर भी, उन लोगों को खिलाते हुए जो सिख नहीं थे और जिनसे कभी पूछा भी नहीं गया।
यह सब ध्यान में रखिए। आगे जो है वह भारत के अपने घर के भीतर हुआ, उस समुदाय के साथ जिसने उस घर का बहुत कुछ बनाया था।
गड़बड़ शुरू कहाँ से हुई
सत्तर के दशक में पंजाब की राजनीति साधारण चीज़ों के बारे में थी: नदियों का पानी पड़ोसी राज्यों के साथ कैसे बँटे, चंडीगढ़ पंजाब का है या हरियाणा का, दिल्ली के मुक़ाबले राज्यों के पास कितनी ताक़त हो। ये असली शिकायतें थीं और बातचीत से हल होने लायक़ थीं।
बातचीत हुई नहीं। ये एक दशक तक सुलगती रहीं, ऐसी उठापटक के बीच जिसमें राष्ट्रीय और राज्य के नेता एक-दूसरे को मात देने के लिए धार्मिक भावना का इस्तेमाल करते रहे, और जिसमें जरनैल सिंह भिंडरांवाले नाम का एक प्रचारक शुरू में उन्हीं लोगों के काम आता रहा जो बाद में उस पर क़ाबू नहीं पा सके। अस्सी के दशक की शुरुआत तक वह और ख़ालिस्तान नाम के अलग राज्य की माँग करते हथियारबंद लोग अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में जम चुके थे, और पंजाब, हरियाणा तथा दिल्ली में राजनीतिक हत्याएँ हो रही थीं।
यहाँ गिनती साफ़ कह देना ज़रूरी है, क्योंकि यह अकसर खो जाती है। पंजाब के अधिकांश सिखों ने कभी ख़ालिस्तान नहीं चाहा। वे एक ऐसी माँग की क़ीमत चुकाने वाले थे जो उन्होंने रखी ही नहीं थी।
जून 1984
जून 1984 में इंदिरा गांधी ने सेना को भीतर जाने की इजाज़त दी। ऑपरेशन ब्लू स्टार रात भर की तोपों की गोलाबारी से शुरू हुआ, फिर टैंक और सैनिक मंदिर परिसर में दाख़िल हुए, और लड़ाई चार दिन-रात चली। भिंडरांवाले और उसके ज़्यादातर बंदूकधारी मारे गए।
और बहुत से दूसरे लोग भी। ब्रिटैनिका दर्ज करता है कि सैकड़ों निर्दोष लोग गोलीबारी के बीच फँस गए और कम से कम सौ सैनिक मारे गए। सिख विवरण यह संख्या काफ़ी अधिक बताते हैं, और कोई एक आँकड़ा कभी तय नहीं हुआ। जून की शुरुआत थी, यानी परिसर तीर्थयात्रियों से भरा हुआ था।
अकाल तख़्त, जो सिख धर्म में सांसारिक सत्ता का आसन है और आस्था की सबसे महत्वपूर्ण संरचनाओं में से एक, बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ।
आगे जो हुआ उसे समझने के लिए यह समझना होगा कि इसने क्या किया, और मुख्य बात मृतकों की गिनती नहीं थी। उन सिखों के लिए जिन्हें ख़ालिस्तान से रत्ती भर सहानुभूति नहीं थी, जिनके बेटे भारतीय सेना में थे, जिन्होंने ज़िंदगी भर कांग्रेस को वोट दिया था, हरमंदिर साहिब के भीतर टैंक एक अलग ही तरह का घाव था। जो सैनिक ख़ुद सिख थे, उन्हें उनके अपने सबसे पवित्र स्थान में भेजा गया था। कुछ ने बग़ावत की। व्यापक और गहरा एहसास यह था कि भारतीय राज्य ने एक पवित्र केंद्र को सैन्य लक्ष्य मानने का फ़ैसला किया है।
इसमें कुछ भी ऐसा नहीं था जो आगे हुए को जायज़ ठहराए। पर कोई ईमानदार विवरण इसे छोड़ भी नहीं सकता।
अक्टूबर और नवंबर 1984
31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी को नई दिल्ली में उनके अपने बग़ीचे में उनके दो सिख अंगरक्षकों ने गोली मार दी।
अगले दिन से भीड़ें दिल्ली और आसपास के सिख मोहल्लों में घूमने लगीं। उन्होंने घर, दुकानें और गाड़ियाँ जलाईं, और लोगों को मारा। करीब तीन हज़ार सिख मारे गए। हज़ारों और घायल हुए, और हज़ारों के पास कुछ नहीं बचा। ब्रिटैनिका इसे विभाजन के बाद का सबसे बुरा धार्मिक दंगा बताता है।
दो बातें साफ़ कहनी हैं, और यह लेख उन्हें एक बार कहकर आगे बढ़ जाएगा।
पहली यह कि यह उस अर्थ में दंगा नहीं था जिसमें कोई भीड़ आपा खो देती है। बचे हुए लोगों ने संगठन का ब्योरा दिया: मतदाता सूचियाँ और सिखों के घरों के पते लेकर आते लोग, और कई जगहों पर खड़ी देखती पुलिस। जाँच आयोगों ने आख़िरकार यही दर्ज किया, दशकों में और बहुत विरोध के बाद।
दूसरी यह कि न्याय में चालीस साल लगे और वह अब भी पूरा नहीं हुआ। आयोग के बाद आयोग बैठे। बहुत लंबे समय तक लगभग किसी को सज़ा नहीं हुई। 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को दोषी ठहराया और उम्रक़ैद सुनाई। फ़रवरी 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें एक अलग मामले में फिर उम्रक़ैद सुनाई, 1 नवंबर 1984 को जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या के लिए। उनकी अपील सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।
जिस देश को यहाँ तक पहुँचने में चार दशक लगे हों, उसे ख़ुद पर गर्व नहीं करना चाहिए। पर पहुँचना मायने रखता है, और यह इसलिए हुआ क्योंकि सिख परिवारों ने फ़ाइलें बंद नहीं होने दीं।
बीच के वर्ष
पंजाब में उसके बाद करीब आठ साल की मारकाट चली, और इस कहानी का यही हिस्सा ईमानदारी से समेटना सबसे कठिन है, क्योंकि इसका कोई ऐसा रूप नहीं है जिसमें ग़लत सिर्फ़ एक पक्ष ने किया हो।
उग्रवादी समूहों ने बहुत लोगों को मारा। उनके अधिकांश शिकार पंजाबी थे और बड़ा हिस्सा सिख था, जिनमें वे भी थे जो उनके ख़िलाफ़ बोले। सबसे घातक एक काम जून 1985 में हुआ, जब एयर इंडिया की उड़ान 182 आयरलैंड के तट के पास हवा में फट गई, जिसमें सवार 329 लोग थे और सब मारे गए। ज़्यादातर भारतीय मूल के कनाडाई थे, और उनमें कई बच्चे थे जो गर्मियों की छुट्टियों पर जा रहे थे। कनाडा में सक्रिय सिख उग्रवादियों पर आरोप लगे; एक व्यक्ति को 2003 में सज़ा हुई, और कनाडा की जाँच तथा मुक़दमे को व्यापक रूप से एक नाकामी माना जाता है।
उग्रवाद-रोधी कार्रवाई भी निर्मम थी। पंजाब पुलिस ने उग्रवाद तोड़ा, और यह कैसे हुआ इसके रिकॉर्ड में क़ानूनी प्रक्रिया के बाहर लोगों के ग़ायब होने और मारे जाने के बहुत सारे दर्ज आरोप शामिल हैं, जिनमें से कुछ की भारतीय अदालतें और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तब से वर्षों तक जाँच करते रहे हैं। परिवार आज भी उन रिश्तेदारों के बारे में पूछ रहे हैं जिन्हें आख़िरी बार अस्सी के दशक के अंत में हिरासत में देखा गया था।
ये दोनों पैराग्राफ़ सच हैं। इनमें से कोई एक लिखकर दूसरा छोड़ देना किसी न किसी दिशा का प्रचार होगा।
करीब 1992 तक उग्रवाद टूट चुका था। पंजाब ने वोट डाला, और डालता रहा।
यह असल में ख़त्म कैसे हुआ
कोई एक नाटकीय अंत नहीं था, न कोई आत्मसमर्पण समारोह, न कोई संधि। इसे ख़त्म किया सख़्त पुलिसिंग, थकान, और इस सीधी बात ने कि पंजाबियों ने उस आंदोलन को लोग देना बंद कर दिया। जो अलगाववादी अभियान सिख समुदाय की आवाज़ होने का दावा करके शुरू हुआ था, वह उसी समुदाय के बिना ख़त्म हुआ, क्योंकि समुदाय देख चुका था कि उस दशक की क़ीमत क्या थी और उसे अपनी ज़िंदगी वापस चाहिए थी।
यह भी एक तरह की जीत है, और वह दिल्ली की नहीं, पंजाब की है।
उसके बाद क्या हुआ
2004 में भारत को एक सिख प्रधानमंत्री मिला। मनमोहन सिंह दस साल इस पद पर रहे, एक ऐसे व्यक्ति जिनका जन्म उस इलाक़े में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है, और जो राजनेता के बजाय अर्थशास्त्री के तौर पर सरकार में आए थे।
11 अगस्त 2005 को नानावटी आयोग की रिपोर्ट पर राज्यसभा की बहस में उन्होंने वह किया जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने नहीं किया था। उन्होंने माफ़ी माँगी।
उन्होंने कहा कि सिख समुदाय से माफ़ी माँगने में उन्हें कोई हिचक नहीं है, और जोड़ा कि ऐसा होने पर वे शर्म से सिर झुकाते हैं।
इससे कोई वापस नहीं आया और किसी को सज़ा नहीं हुई। बहुत से सिखों को यह बहुत देर से और बहुत कम लगा, और यह प्रतिक्रिया पूरी तरह वाजिब है। पर इसका आकार देखिए। स्वर्ण मंदिर में टैंक जाने और दिल्ली में सिखों का शिकार होने के इक्कीस साल बाद, भारत सरकार का मुखिया एक सिख था, और वह संसद में खड़ा होकर देश की ओर से उसके लिए माफ़ी माँग रहा था।
यह वह देश नहीं है जिसने किसी समुदाय को निकाल बाहर किया। यह वह देश है जिसने एक समुदाय को चोट पहुँचाई और फिर, धीरे-धीरे, अपर्याप्त ढंग से और देर से ही सही, यह कहना शुरू किया।
पंजाब आज कहाँ है
राज्य तीस साल से शांत है। उसकी दूसरी दिक़्क़तें हैं, और गंभीर हैं: भूजल हर साल नीचे जा रहा है, ठीक उसी फ़सल-चक्र के नीचे जिसने भारत का पेट भरा था, खेती की आमदनी दब रही है, नशे की समस्या है, और नौजवान कनाडा तथा ऑस्ट्रेलिया इतनी संख्या में जा रहे हैं कि गाँव ख़ाली हो रहे हैं। पंजाब आज असल में इन्हीं पर बहस कर रहा है, और इनमें से कोई भी ख़ालिस्तान के बारे में नहीं है।
इस बीच योगदान कभी रुका नहीं। सेनाओं में सिखों की भारी मौजूदगी बनी हुई है। 2021 में जब दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन ख़त्म हो गई, सिख संस्थाओं ने सड़कों पर ऑक्सीजन लंगर लगा दिए। जो भी आ जाए उसे बिना यह पूछे खिला देने की आदत इस लेख की हर राजनीतिक बहस से ज़्यादा टिकाऊ निकली है।
पंजाब ने जो दशक खोया वह असली था, और उस दशक में सिखों के साथ जो हुआ वह भी असली था, और भारत के लिए बेहतर यही है कि वह दोनों को खुलकर कहे, न कि उन्हें किसी फ़ुटनोट में पड़ा रहने दे। पर आख़िर में याद रखने लायक़ बात साधारण है: गेहूँ आता रहा, पलटनें भरती रहीं, रसोइयाँ चलती रहीं, और जो राज्य यह सब झेलकर निकला वह आज भी, पूरी तरह और बिना किसी शर्त के, भारत है।
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
- Encyclopædia Britannica: India, Sikh separatism
- Encyclopædia Britannica: Operation Blue Star
- Encyclopædia Britannica: Air India Flight 182 disaster
- The Tribune, Chandigarh, 12 August 2005: Manmohan apologises to Sikhs for the 1984 riots
- Akashvani News, 25 February 2025: Delhi court awards life imprisonment to Sajjan Kumar in a 1984 case
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